ब्याज एक समाजिक बुराइ है,जिससे जरूरत मंद लोगो का शोषण और उनका उत्पीडन किया जाता है.इस्लाम दीन फितरत है.अल्लाह का बनाया हुआ दीन है,इसी वजह से ब्याज को बहुत बुरा और गुनाह -ऐ-अज़ीम बताया है.नबी पाक सल्लाहू अलैय्ही वसल्लम ने इसके बारे में सख्त हिदायात ब्यान फरमाई हैं.

हज़रत अबू हुरैरा रजि.से रिवायत है कि रसूल उल्लाह सल्लाहू अलैय्ही वसल्लम ने इरशाद फरमाया कि ब्याज के गुनाह के सत्तर हिस्सों में से सबसे कम हिस्सा यह है कि कोई शख्स अपनी माँ से यौन सम्बन्ध बनाये.( मिश्कात उल मसाबिह)

हजरत जाबिर रज़ि से रिवायत है कि रसूल अल्लाह स्ल्लाहू अलैय्ही वसल्लम ने ब्याज लेने वालों और देने वालों और उसके लिखने वालों पर,और ब्याज के लिए गवाह बनने वालों पर लानत फरमाई है,और फरमाया कि यह सब ब्याज के ममाले में बराबर के गुनेहगार हैं(इमाम बुखारी और इमाम मुस्लिम ने इस हदीस को अपनी किताबो में रिवायत किया है )

जैसे अपनी माँ के साथ यौन सम्बन्ध बनाने को कोई शख्स बुरा समझता हो ऐसे ही उसको ब्याज का कारोबार करने को भी बुरा समझना चाहिए.ब्याज की हुरमत का अंदाजा आप उपर ब्यान की गई दोनों हदीसों से लगा सकते हैं कि कितने सख्त और नापसंदीदा लहजे में अल्लाह के नबी ने इसके बारे में मना किया है.लेकिन आज हमारे समजा में लोग इस बुराई में लिप्त हैं और नाम बदलकर इस गंदे काम को कर रहे हैं.लिहाज़ा नाम बदलने से इसके बारे में बताई गई हुरमत खत्म नही हो जायगी.

ब्याज का माल हमेशा नहूसत और बीमरियां और बुराइयाँ पैदा करता है,इन्सान थोड़े से वक्त की ख़ुशी के लिए अपने आपको नर्क का इंधन बनता है.ब्याज लेने वाले के यहाँ का खाना भी नापसंदीदा है.जो व्यक्ति ब्याज लेने का अपराध करे उसको समझाना चाहिए और उसको इस बुराई से बचाने के लिए सच्चे मन से सच्ची तडप पैदा करके उसको नहूसत और बेबरकती से दूर रखने की कोशिस करनी चाहिए.

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