हुज़ूर सल्लाहु अलय्ही वसल्लम ने इरशाद फरमाया है:ईमान की मिठास उसी को नसीब होगी,जिसमें तीन बातें पाई जाएँगी।(1) अल्लाह और उसके रसूल की मोहब्बत इसके दिल में सबसे ज़्यादा हो।(2) जिस शख्स से भी मोहब्बत हो सिर्फ अल्लाह अल्लाह के लिए हो।(3)ईमान लाने के बाद वापस कुफ़्र की तरफ पलटने से उसको इतनी ही नफरत हो और ऐसी तकलीफ हो जितनी आग में डाले जाने से होती है।(इमाम बुखारी ने अपनी किताब सही बुखारी में रियावत किया है)
तीन सिफ़ात और अच्छाईयाँ पाई जाएं वह ईमान की मिठास पाएगा क्योंकि जो शख्स दुनिया की सब चीज़ों से ज़्यादा अल्लाह और रसूल से मोहब्बत करेगा वो दुनिया में भी कामयाब होगा और आख़िरत में भी कामयाब होगा।क्योंकि उसके दिल में दुनिया की मोहब्बत नही होगी उसका दिल दुनिया की मोहब्बत से खाली होकर अल्लाह और रसूल की मोहब्बत से भरा होगा तो ईमान के समाने दुनिया की कोई चीज़ क़ीमती नही होगी।वह राहत और सुकून महसूस करेगा।

मुसलमान जिस से मोहब्बत करे अल्लाह के लिये और जिस से नफरत करे अल्लाह के लिये।अल्लाह के नबी ने रिश्तेदारों के साथ अच्छा सुलूक करने का हुक्म दिया और इस पर सवाब का भी वादा किया है।अगर मुसलमान अल्लाह का हुक्म मानकर दोस्ती और रिश्तेदारी करेगा तो इस पर भी सवाब मिलेगा।और जो शख्स अल्लाह की नफरमानी करे और मना करने पर भी ना रुके ऐसे शखस से दोस्ती ना की जाए।

ईमान की दौलत नसीब होजाने के बाद कुफ़्र और अन्धकार में वापस लौटने को कोई भी पसन्द नही करता है क्योंकि उसके दिल को जो चैन सुकून राहत नसीब होता है वो किसी डॉक्टर या हकीम के पास नही है।लेकिन अगर कोई शख्स कुफ़्र और शिर्क की बुराई को ना समझे और दिल से बुरा ना जाने और वापस लोट जाने के ख्याल को आग में जलकर ख़ाक होजाना ना समझें तो ऐसा शख्स ईमान का मिठास नही चख सकता है।

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