हुज़ूर सल्लाहु अलय्ही वसल्लम मस्जिद नबवी में ख़ुज़ूर के एक सुतून(स्तम्भ/खम्बा) से सहारा लगाकर ख़ुत्बा(नसीहत/तक़रीर) दिया करते थे उसके बाद जब मिम्बर तय्यार होगया तो आप सल्लाहु अलय्ही वसल्लम ने मिम्बर पर ख़ुत्बा दिया तो वह अचानक जुदाई के सदमें में वह सुतून(खम्बा)चिल्ला कर रोने लगा।हुज़ूर सल्लाहु मिम्बर से उतरे और उसको अपने बदन से चिमटाया तो वह हिचकियाँ लेने लगा तो आप सल्लाहु अलय्ही वसल्लम ने फ़रमाया:ये सुतून हमेशा ज़िक्र(ख़ुत्बा)सूना करता था अब इसने नही सूना तो यह रोने लगा।(ईमाम बुखारी ने अपनी किताब सही बुखारी में रिवायत किया है)

नबी पाक से दुनिया के हर ज़र्रे को मुहब्ब्त थी,हर एक चीज़ यह चाहती थी कि वह नबी से ज़्यादा से ज़्यादा क़रीब रहे।हुज़ूर सल्लाहु अलय्ही वसल्लम मोहिसन थे,कायनात का ज़र्रा ज़र्रा आपके अहसानमन्द है।जानवर आपसे अपने मालिक की शिकायत किया करते थे,कंकर पत्थर आपको सलाम किया करते थे,आपकी ऊँगली के इशारे से चाँद के दो टुकड़े होगए थे,लाखो करोड़ो मील का रास्ता मेराज़ की रात में आप सल्लाहु अलय्ही वसल्लम ने सैकंडों और लम्हों में पूरा किया था।आप सात आसमान से भी ऊपर का सफर एक रात में तय करके वापस आये थे।यह सब की सब बातें आप सल्लाहु अलय्ही वसल्लम को अल्लाह की तरफ से दिए गए विशेष अधिकारों में से थी।जिनको दुनिया मोअज़ीज़ा कहती है।

Facebook Comments
SHARE