मेहदी हसन ऐनी क़ासमी
मौलाना अन्ज़र शाह क़ासमी बेंगलौरी जिन्हें पिछले 2 साल पहले देश के कई बड़ी एजोंसियों ने अलक़ायदा से जोड़ कर गिरिफ्तार किया था,उन पर टेरर फंडिंग,अलक़ायदा की मिम्बरशिप के लिये नौजवानों को भड़काने,भारत में अलकायदा को मज़बूत करने और बार बार पाकिस्तान का दौरा करने का इल्ज़ाम लगाया गया था,अन्ज़र शाह कासमी की गिरिफ्तारी के बाद हमेशा की तरह भारतीय मीडिया ने उन्हें कुख्यात आतंकी,भारतीय सलामती के लिय ख़तरा और मोस्ट वांटेंड टेरेरिस्ट बताया,ज़ी न्यूज़,आज तक,ए.बी.पी,नौ भारत टाईम्स,दैनिक जागरण,अमर उजाला जैसे मीडिया के बड़े प्लेटफार्म्स ने खूब विधवा विलाप किया,बार बार मौलाना को ग़द्दार,आतंकी और अलक़ायदा का एजेंट बताया गया,

जांच चली,जमीयत उलमा ए हिंद ने मुक़दमा लड़ने का फैसला किया,मौलाना अरशद मदनी ने हमेशा की तरह टॉप लेवल के वकीलों को लगाया,2 साल तक ATS और पुलिस मौलाना पर लगाये गये इल्ज़ामात को साबित करने लिये वक़्त मांगती रही,लेकिन जब कोई सुबूत ही नहीं था,इल्ज़ामों में कोई सच्चाई ही नहीं थी तो इन एजेंसियों को क्या मिलता?

अाखिर कार 2 साल के बाद दिल्ली को पटियाला हाऊस कोर्ट ने ये कहते हुये अन्ज़र शाह कासमी का मुकदमा डिस्चार्ज कर दिया कि अन्ज़र शाह की तकरीरों में कोई भी बात भड़काऊ नहीं मिली,

और ना ही इन्होंने कभी पाकिस्तान का दौरा किया.
इंसाफ़ की जीत हुयी,अन्ज़र शाह क़ासमी रिहा हो गये,लेकिन सवाल ये है कि

 अन्ज़र शाह के वो 2 साल कौन लौटायेगा? 

जो उन्होंने जेल की सलाखों के पीछे गुज़ारे? 

इन पर जांच एजेंसियों द्वारा लगाये गये झूठे इल्ज़ाम,उन पर किये गये ज़ुल्म और थर्ड डिग्री का जिम्मेदार और जवाबदेह कौन होगा??

गिरिफ्तारी के वक़्त विधवा विलाप,और रिहाई के बाद चुप्पी की पॉलिसी अपनाने वाली भारतीय मीडिया का दोहरा चरित्र फिर से सामने आ गया 

क्या मीडिया के इस दोग़लेपन पर कोई सारकारी एजेंसी या अदालत एक्शन लेगी???
मुफ्ती अब्दुल क़य्यूम,मौलाना उमर दीन,अंज़र शाह कासमी जैसे हज़ारों बाईज़्ज़त भारतीय शहरियों के 10 से 15 साल बरबाद करने वाले अधिकारियों और एजेंसियों पर कौन कार्रवाई करेगा??

क्या अदालतों द्वारा सिर्फ़”नो गिल्टी” कह देना काफ़ी होगा?

क्या एक इंसाफ़ पसंद इंसान होने के नात़े हर भारतीय की ये ज़िम्मेदारी नहीं है कि इस दोहरेपन,झूठ और अंधी कार्रवाई के विरुद्ध उठ खड़े हों,क्योंकि हर आतंक के पीछे मुसलमान का नाम ढूंढना संघी मानसिकता है जो भारत जैसे विशाल गणतंत्र और दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र के लिये नासूर है…

इस लिये न्यायपालिका पर भी फर्ज़ है कि वो इस सिलसिले में ठोस क़दम उठाये और जवाबदेही तै करे ताकि नेशनल सिक्योरिटी के नाम पर बेगुनाहों की ज़िंदगी से खिलवाड़ बंद हो सके…….

(यह लेखक के निजी विचार हैं)

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