मुफ़्ती उसामा इदरीस नदवी के क़लम से
मीडिया मुद्दों से भटकाने का काम कर रही है।

मीडिया असल मुद्दों से भटकाने का काम कर रही है देश में रोज़ाना एक ना एक नई जँग छिड़ जाती है है अगर दुनिया की 7.1 अरब आबादी में अस्सी करोड़ यानी बारह फीसद लोग भुखमरी के शिकार हैं। तो बीस करोड़ भुखमरी के शिकार लोगों की संख्या के साथ भारत इसमें पहले नंबर पर है।खाद्य एवं कृषि संगठन की 2017 की रिपोर्ट के मुताबिक भारत में कुपोषित लोगों की संख्या 19.07 करोड़ है। यह आंकड़ा दुनिया में सर्वाधिक है। देश में 15 से 49 वर्ष की 51.4 फीसद महिलाओं में खून की कमी है। पांच वर्ष से कम उम्र के 38.4 फीसद बच्चे अपनी आयु के मुताबिक कम लंबाई के हैं। इक्कीस फीसद का वजन अत्यधिक कम है। भोजन की कमी से हुई बीमारियों से देश में सालाना तीन हजार बच्चे दम तोड़ देते हैं।इन मुद्दों पर बात करने के लिये मीडिया पर आज समय नही है क्योंकि यह कोई मसालेदार न्यूज़ नही है।

देश के मौलिक मुद्दों से हटकर फालतू बेबुनियाद मुद्दों को उठाना देश से मुहब्ब्त नही देश के साथ दुश्मनी है,मीडिया की दूकान इस देश में सिर्फ मुसलमानों से चल रही है,कभी आतँकवाद,कभी तीन तलाक़ तो अब देवबन्द के फतवों से मीडिया अपनी टीआरपी बढ़ाने का काम कर रही है।

फतवे से फितना खड़ा कर रही है

फ़तवा शरई हुक्म की जानकारी का नाम है,और शरीयत के बारे में जानकारी कुर्ता पाजामा पहने,दाढ़ी टोपी वाला हर कोई नही दे सकता जैसे मेडिकल साईंस के बारे में जानकारी डॉक्टर को होती है,और भवन निर्माण की जानकारी सिविल इंजीनियर्स को होती है वैसे ही शरीयत की बारीकियों और उसकी नौक औ पलक की जानकारी सिर्फ और सिर्फ एक मुफ़्ती को होती है।मुफ़्ती फ़तवा देने का अधिकार रखता है,वह एक अथॉरटी की हैसियत रखता है।हर कोई मौलवी फ़तवा नही दे सकता है।जैसे एक इंजीनियर मेडिकल के बारे में नही बता सकता और डॉक्टर इंजीनियरिंग नही जानता है वैसे ही हर कोई शख्स फ़तवा देना नही जानता है।फ़तवा देने के कुछ मापदंड होते हैं नबी पाक परिस्तिथि के अनुसार फ़तवा दिया करते थे।स्थिति और परिस्थिति को ध्यान में रखकर बोलना इस्लाम इस्लाम की विशेष पहचान है।

मीडिया कर रही है बदनाम

देवबन्द में दर्जनों नही सैकड़ों मदरसे हैं,हज़ारों दाढ़ी टोपी वाले कुर्ता पाजामा पहने मौलवी रहते हैं,देवबन्द एक शहर है और दारुल उलूम देवबन्द एक विश्वविख्यात विश्वविद्यालय है जिसका पूरी दुनिया में आदर सम्मान किया जाता है।और दारुल उलूम से जुडी हुई हर एक बात को पूरी दुनिया के मुसलमान भरोसा रखते हैं मीडिया देवबन्द में किसी भी मदरसे के मौलवी को पकड़ कर उसकी राय लेती है,राय देने वाला अपने भोलेपन में मीडिया का शिकार होकर राय देता है लेकिन मीडिया उसे दारुल उलूम से जोड़कर चलाती है,जिस वजह से पूरी दुनिया के मुसलमानों की आस्था और भरोसे को ठेस पहुँचती है।पिछले एक महीने में तीन फतवे देवबन्द से आये (1)महिलाओं की आईब्रो बनवाने का क्या हुक्म है? हिन्दोस्तान अखबार की न्यूज़ वेबसाईट पर लिखा गया है कि

  “सात अक्टूबर को दारुल उलूम देवबन्द ने मुस्लिम महिलाओं के लिये चौंकाने वाला फ़तवा जारी किया था,दारुल उलूम के फतवे में मुस्लिम महिलाओं को हेयर कटिंग और आइब्रो बनवाना नाजायज़ है.दारुल उलूम के फ़तवा विभाग के मौलाना लुतफुर्रहमान सादिक़ क़ासमी ने यह फ़तवा जारी किया था” 

एक दुसरा फ़तवा जिसे मीडिया दारुल उलूम से जोड़कर आजदी पर प्रहार बताया।

21 अक्टूबर 2017 को सोशल मीडिया में एक हंगामा मचा हुआ था एक फतवे को लेकर,टीवी चैनल्स पर डिबेट होरही थी कुछ लोग इसे आज़ादी पर प्रहार बता रहे थे तो कुछ लोग इस्लाम और मुसलमानों को कट्टरता का प्रमाण बता रहे थे।मीडिया ने लिखा “दारुल उलूम देवबन्द ने फ़तवा जारी करके सोशल मीडिया पर मुस्लिम पुरुषों और महिलाओं को फोटु अपलोड करने को नाजायज़ बताया है,इस सम्बन्ध में मुफ़्ती तारिक़ क़ासमी का कहना है कि जब इसलाम में बिना ज़रूरत पुरुषों और महिलाओं की फोटु खिंचवाना जायज़ ना हो तब सोशल मीडिया पर फोटु अपलोड करना जायज़ कैसे होसकता है।

दारुल उलूम से नाम जोड़ना गलत है।

मुफ़्ती अबुल क़ासिम नोमानी बनारसी साहब से फोन पर इस सम्बन्ध में बात चीत हुई तो उन्होंने कहा कि मौलाना लुतफुर्रहमान सादिक़ क़ासमी नाम का कोई शख्स दारुल उलूम देवबन्द में नही है।लेकिन मीडिया इनको बराबर दारुल उलूम से जोड़कर इनको फ़तवा विभाग का का मोलना बता रही है।

मुफ़्ती तारिक़ क़ासमी यह देवबन्द के रहने वाले हैं,दारुल उलूम के फ़ाज़िल हैं,और जामिया हुसैनिया देवबन्द में पढ़ाते हैं इनका दारुल उलूम देवबन्द से कोई ताल्लुक़ नही है।

दारुल उलूम को बदनाम करना मक़सद है

इस प्रकार से किसी भी मुद्दे के बारे में किसी दाढ़ी टोपी वाले को पकड़ कर उसकी राय लेकर दारुल उलूम से जोड़कर मीडिया के द्वारा चलाये जाना दारुल उलूम को बदनाम करने की एक साज़िश है,दुनिया भर के मुसलानों का दारुल उलूम से भरोसा तोड़ने की एक कोशिस है,दारुल उलूम देवबन्द के जिम्मेदारों को इस सम्बन्ध में क़ानूनी कार्यवाही करनी चाहिए।

यूँ ना फतवे जारी करो तुम

उलेमा हज़रात से अपील करता हूँ कि क़ौम की बड़ी ज़िम्मेदारी आपके काँधों पर है,आप किसी की साज़िश का शिकार ना बनो,क़ौम की रहनुमाई के लिये आपके पास मस्जिद के मिम्बर औ मेहराब है आप वहाँ से हुक्म दो।मीडिया में इस तरह के फ़ालतू मुद्दों पर राय देने के फायदे कम नुक़सान ज़्यादा होंगे।कहीँ खुदनुमाई और शोहरत के चक्कर में हमारी वजह से पूरी क़ौम गुमराह ना होजाये।

मुसलमान ना हों तो मीडिया भूखे मर जाए

इस देश में मीडिया और राजनीति को चलाने और इनके परिवार को पालने का काम मुसलमान कर रहा है,अगर मुसलमान इनकी चालो को समझ जाए तो यह लोग भूखे मर जाएँगे।


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