सऊदी अरब के प्रिंस मुहम्मद सलमान के सत्ता संभालने से पहले ही सऊदी अरब में उदारवाद की हवा बहने लगी है। बेहद रुढ़िवादी देश माने जाने वाले सऊदी अरब के शक्तिशाली शहजादे बिन सलमान ने देश में उदार और खुले इस्लाम के पालन का संकल्प जताया है। 
   कट्टर इस्लामिक देश सऊदी ने “मॉडर्न सऊदी अरब” बनने का फैसला कर लिया है। उन्होंने कहा कि हमारे देश की 70 फीसदी आबादी 30 साल से कम उम्र वाली है और हम अपनी जिंदगी के अगले 30 साल विनाशकारी विचारों के साथ निपटते हुए नहीं गुजारना चाहते। 

    वर्ष 1979 से पहले सऊदी अरब भी उदार और खुले विचारों वाला देश बनने की ओर बढ़ रहा था। लेकिन इसी समय हुई ईरानी क्रांति ने उसके सुन्नी शासकों के भीतर शिया वर्चस्व का भय पैदा किया, जिसकी काट के लिए उन्होंने इस्लाम की कट्टरपंथी वहाबी विचारधारा को न सिर्फ अपने यहां बढ़ावा दिया, बल्कि इसे पूरे विश्व में फैलाने की कोशिश की थी। 

   सुन्नियों में एक समूह ऐसा भी है जो सल्फ़ी और अहले-हदीस और वहाबी आदि के नाम से जाना जाता है इस सोच को परवान चढ़ाने का सेहरा इब्ने तैमिया (1263-1328) और मोहम्मद बिन अब्दुल वहाब (1703-1792) के सिर पर बांधा जाता है और मोहम्मद बिन अब्दुल वहाब के नाम पर ही यह समुदाय वहाबी नाम से भी जाना जाता है। यह सांप्रदायिक तौर पर बेहद कट्टरपंथी और धार्मिक मामलों में बहुत कट्टर है. सऊदी अरब के मौजूदा शासक इसी विचारधारा को मानते है। 

    सऊदी अरब पर तालिबान और अलकायदा से लेकर आईएस तक तमाम सुन्नी आतंकी संगठनों को पैसे और अन्य साधनों से मदद देने के आरोप लगते रहे हैं। लेकिन उसकी लगाई आग अब उसे ही झुलसा ही रही है। कुछ ही महीने पहले आईएस ने खुलेआम धमकी दी थी कि ईरान के बाद उसका अगला निशाना सऊदी अरब होगा। 

  प्रिंस मुहम्मद सलमान को अहसास हो गया है कि दुनियाभर के कट्टरपंथी मदरसों और इस्लामी संगठनों पर पैसे खर्च करने से अच्छा है, अपने युवाओं के रोजी-रोजगार की फिक्र की जाए। अभी हाल में ही वहां महिलाओं को गाड़ी चलाने की मंजूरी दे दी गई है।

   आठवीं और नवीं सदी में लगभग 150 साल के अंदर चार प्रमुख धार्मिक नेता इमाम अबू हनीफ़ा (699-767 ईसवी), इमाम शाफ़ई (767-820 ईसवी), इमाम हंबल (780-855 ईसवी) और इमाम मालिक (711-795 ईसवी) पैदा हुए थे। 

    भारत में 20वीं सदी के शुरू में दो धार्मिक नेता मौलाना अशरफ़ अली थानवी (1863-1943) और अहमद रज़ा ख़ां बरेलवी (1856-1921) ने इस्लामिक क़ानून की अलग-अलग व्याख्या की थी। अशरफ़ अली थानवी का संबंध दारुल-उलूम देवबंद मदरसे से था, जबकि आला हज़रत अहमद रज़ा ख़ां बरेलवी का संबंध बरेली से था। मौलाना अब्दुल रशीद गंगोही और मौलाना क़ासिम ननोतवी ने 1866 में देवबंद मदरसे की बुनियाद रखी थी।  देवबंदी सऊदी अरब में पैदा हुए वहाबी इस्लाम को मानते हैं। दक्षिण भारत ख़ासकर केरल में वहाबी विचारधारा बहुत ही ख़तरनाक तरीक़े से फ़ैल रही है । जम्मू कश्मीर के सूफ़ी कल्चर को इन वहाबी और अलगाववादी लोगों द्वारा पूर्ण रूप से तबाह करने की साज़िश रची जा रही है, और वहाबियों की इस मुहिम को सारा पैसा सऊदी अरब से आ रहा है।

   वहाबी विचारधारा की तबलीग करने वालों ने कभी मुसलमानों की मूल समस्याओं जैसे गरीबी, अशिक्षा, रोजगार और स्वास्थ्य को ठीक करने की तो कोई तरकीब नहीं बताई अलबत्ता उन्हें वहाबी बनाकर छोड़ दिया। दुनिया में वहाबी विचारधारा के विरोध में अरब के बाहर पहला फतवा बरेली के मशहूर इस्लामी विद्वान और चिंतक अहमद रजा खां साहब ने जारी किया था। दुनिया में मुस्लिम समाज आज ऐसे कगार पर है जहां जमाने से तालमेल बैठाने में उसे दिक्कत आ रही है। इसलिए कट्टर इस्लामिक देश सऊदी का “मॉडर्न सऊदी अरब” बनने का फैसला सराहनीय है और भारत में भी इसका अच्छा संदेश जायेगा।

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