लखनऊ। यूपी में विधानसभा चुनाव की आहट हो चुकी है। राजनीतिक पार्टियां वोटों की जोड़-तोड़ और गुणा भाग में लगी हैं। ऐसे में प्रदेश में बनते नए सियासी समीकरण की बढ़ती संभावना ने सियासी धुरंधरों के माथे पर बल ला दिया है। उत्तर प्रदेश में असदउद्दीन ओवैसी की ज़ोरदार ऐंट्री और उनके जय मीम,जय भीम के नारे से मुस्लिम सपा सुप्रीमो मुलायम सिंह यादव के माई समीकरण ( MY मुस्लिम+यादव ) से टूटन शुरु हो गई है और मुस्लिम युवाओ में सबसे ज़्यादा पसन्द किये जाने वाला नेता असदउद्दीन ओवैसी बन चूका है।

बीएसपी सुप्रीमो मायावती का डीएम समीकरण ( DM दलित+मुस्लिम )को भी तकड़ा झटका लगा । मायावती को मुस्लिम वोटो का बड़ा भ्रम था लेकिन ओवैसी के उत्तर प्रदेश में आने से मुसलमान उससे खिसक गया है,साथ ही साथ ओवैसी ने जय मीम और जय भीम का नारा देकर दलित वोटों को भी अपने पाले में करना शुरू कर दिया  है।

मुलायम से नाराज हैं मुस्लिम?

दरअसल 2012 के विधानसभा चुनाव में समाजवादी पार्टी ने मुसलमानों से आरक्षण, शिक्षा सहित कुल 16 वादे किए थे। इन वादों पर सपा को मुसलमानों का जोरदार समर्थन भी हासिल हुआ था। एक आंकड़े के मुताबिक 2012 के विधानसभा चुनाव में करीब 45 फीसदी मुसलमान वोट समाजवादी पार्टी की हिस्से में आया था। लेकिन सरकार के 4 साल पूरे हो जाने के बाद भी अभी तक सपा सरकार मुसलमानों को आरक्षण देने की बात तो दूर आरक्षण पर बात भी नहीं की है। वहीं प्रदेश में एक के बाद एक लगातार हुए 400 से ज्यादा दंगों ने भी सपा सरकार के खिलाफ मुसलमानों की नाराजगी को बढ़ा दिया है। मुसलमानों का कहना है कि अखिलेश सरकार आरक्षण देना और चुनावी वादे पूरा करना तो दूर वह मुसलमानों को सुरक्षा भी नहीं दे पाई। प्रदेश के मुसलमानों का कहना है कि वह सरकार से अपना हक मांगने से पहले सुरक्षा मांगते हैं।

बीजेपी और माया को सता रहा है DM का डर।

उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव से पहले भारतीय जनता पार्टी और बहुजन समाज पार्टी को असदउद्दीन ओवैसी के उत्तर प्रदेश में दलित और मुस्लिम के समीकरण बनने की चिंता सता रही है।Aimim पार्टी के मुख्या असद्उद्दीन ओवैसी लगातार अपने ब्यानो से और अपने नारों से मुस्लिम दलित को अपने साथ लाने की  कोशिश में हैं।

मायावती को चिंता है कि अगर मुस्लिम वोट सपा से हटकर पूरी तरह से असद्उद्दीन ओवैसी के साथ चला गया तो दलित पिछडो का रूझान ओवैसी की ओर बढ़ जाएगा, ऐसे में उनका लखनऊ के तख्त पर काबिज होने के ख्वाब को झटका लग सकता है।

यूपी में बढ़ती दलितों की लामबंदी

यूपी में ओवैसी के प्रति दलित लगातार लामबंद हो रहे हैं। रोहित वेमुला प्रकरण, आरक्षण पर प्रहार, दलितों पर लगातार हो अत्याचार जैसे घटनाओं पर असद्उद्दीन ओवैसी के बयानों से और दलितों की आवाज़ संसद में उठाने तथा अम्बेडकर को गाँधी से बड़ा लीडर मानने की वजह  से दलित मतदाता ओवैसी को निराश नही करेंगे हो ।

सपा को यही चिंता सताए जा रही है कि अगर दलित, मुस्लिम एकजुट हो गए तो फिर ओवैसी को उत्तर प्रदेश की राजनीति का सबसे बड़ा नायक बनने से कोई रोक नही सकता है।

भाजपा ने दलित को फँसाने के लिये नया जाल फेँका !!!

दलितों को साधने की कोशिश में बीजेपी अध्यक्ष अमित शाह दलितों के घर भोजन करने जाते हैं, साथ ही बीजेपी अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी में दलित और ओबीसी आरक्षण मुद्दे को भी हवा दे रही है जिससे दलित वोटों में सेंधमारी की जा सके।

दलित वोटों को एकजुट रखना मायावती की चुनौती

प्रदेश में हर रोज बनते नए सियासी समीकरण के बीच मायावती की सबसे बड़ी चुनौती दलितों वोटों को एकजुट बनाए रखना है। दलित वोटों पर ओवैसी,बीजेपी और कांग्रेस की पैनी नजर है। जिस दलित, मुस्लिम, ब्राह्मण पर मायावती फोकस कर रही हैं, उसी समीकरण पर असद्उद्दीन  ओवैसी और कांग्रेस भी तेजी से काम कर रही है। बीजेपी भी दलितों और ब्राह्मणों पर डोरे डाल रही है। ऐसे में मायावती पर अपने दलित वोट बैंक को बचाए रखने का दबाव और ज्यादा बढ़ गया है। आपको बता दें कि मायावती इससे पहले 2007 के विधानसभा चुनाव में दलित, मुस्लिम और ब्राह्मण के समीकरण पर यूपी की सत्ता में प्रचंड बहुमत से सरकार बना चुकी हैं।

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